इंदौर
11 अक्टूबर को इंदौर के होलकर स्टेडियम में भारत और वेस्टइंडीज के बीच होने वाले टी-20 मुकाबले की तैयारियां अब आधुनिक तकनीक के साथ की जा रही हैं। मैदान में पहली बार 200, 500 और 750 किलोग्राम वजन वाले आधुनिक रोलर मंगाए गए हैं। ये पुराने मैनुअल रोलर की तुलना में आकार में बड़े हैं और इनके वजन का वितरण भी अलग तरीके से किया गया है। इन्हें चेन्नई से इंदौर लाया गया है।
इन आधुनिक रोलर के पीछे क्रिकेट पिच की मिट्टी, नमी, घास की जड़ों और गेंद के उछाल को लेकर हुई वैज्ञानिक रिसर्च है। इंग्लैंड की क्रैनफील्ड यूनिवर्सिटी और इंग्लैंड एंड वेल्स क्रिकेट बोर्ड (ECB) से जुड़े शोध में पिच की नमी, मिट्टी की स्थिति और रोलर के दबाव के मैच के दौरान सतह के व्यवहार पर पड़ने वाले असर का अध्ययन किया गया है।
यानी पिच तैयार करते समय अब यह तय करना भी जरूरी है कि कितना रोलिंग करना है, किस वजन का रोलर इस्तेमाल करना है और उस समय मिट्टी में कितनी नमी है।
केवल भारी रोलर चलाने से पिच बेहतर नहीं होती
क्रिकेट में लंबे समय तक यह धारणा रही कि भारी रोलर चलाने से पिच ज्यादा सख्त होगी और बल्लेबाजी के लिए बेहतर सतह तैयार होगी। हालांकि, आधुनिक पिच साइंस में रोलिंग का असर मिट्टी की नमी और पिच की संरचना पर निर्भर करता है। पिच कब और कितनी देर रोल की जाए, इसका संबंध मिट्टी के सूखने की प्रक्रिया से भी है।
यदि नमी और रोलिंग का संतुलन ठीक नहीं है तो जरूरत से ज्यादा दबाव सतह की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है। पिच पर मौजूद घास भी अहम भूमिका निभाती है। उसकी जड़ें मिट्टी के भीतर से नमी खींचने में मदद करती हैं। पिच की तैयारी के दौरान घास की स्थिति, मिट्टी की नमी और सतह की मजबूती को साथ-साथ देखा जाता है।
रोलर का काम सिर्फ मिट्टी दबाना नहीं
आधुनिक रोलिंग तकनीक का एक अहम उद्देश्य पिच पर समान उछाल यानी यूनिफॉर्म बाउंस बनाए रखना भी है। मैच से पहले रोलर चलाने का मकसद सिर्फ सतह को कठोर करना नहीं होता। खिलाड़ियों की आवाजाही, मौसम और नमी के कारण सतह में आने वाले छोटे बदलावों को भी रोलिंग के जरिए नियंत्रित किया जाता है।
पिच के अलग-अलग हिस्सों की कठोरता या सतह में अंतर होने पर गेंद की उछाल भी बदल सकती है। ऐसे में रोलिंग तकनीक का इस्तेमाल सतह को अधिक समान रखने के लिए किया जाता है।
200, 500 और 750 किलो के तीन विकल्प
होलकर स्टेडियम में इस बार 200, 500 और 750 किलोग्राम वजन वाले तीन आधुनिक रोलर उपलब्ध हैं। ग्राउंड की स्थिति और मौसम के अनुसार इनमें से उपयुक्त रोलर का इस्तेमाल किया जा सकता है।
इनकी खासियत सिर्फ वजन नहीं है, बल्कि वजन का वितरण भी पुराने मैनुअल रोलर से अलग है। इससे पिच पर पड़ने वाले दबाव को नियंत्रित तरीके से इस्तेमाल करने का विकल्प मिलता है।
BCCI ने दिए थे रोलर की व्यवस्था के निर्देश
मध्य प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के CEO रोहित पंडित ने बताया कि ये पुराने मैनुअल रोलर की तुलना में नया डेवलपमेंट है। इनके वजन का वितरण अलग तरीके से किया गया है, जिससे पिच तैयार करने में फायदा मिल सकता है।
उन्होंने बताया कि BCCI की ओर से इन रोलर की व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए थे। इसके बाद इन्हें चेन्नई से इंदौर मंगाया गया है।
मौसम तय करेगा कौन सा रोलर चलेगा
विशेषज्ञों के मुताबिक, क्रिकेट पिच की तैयारी में मौसम की अहम भूमिका होती है। तापमान, नमी, बारिश और मिट्टी की स्थिति के अनुसार रोलिंग का तरीका बदल सकता है।
हर परिस्थिति में एक ही वजन के रोलर का इस्तेमाल जरूरी नहीं है। पिच की मौजूदा स्थिति के आधार पर कम या ज्यादा वजन वाले रोलर का चयन किया जा सकता है। यही वजह है कि होलकर स्टेडियम में तीन अलग-अलग वजन के रोलर उपलब्ध कराए गए हैं।
इंग्लैंड से शुरू हुई पिच की ‘साइंस’ अब भारतीय क्रिकेट में
इंग्लैंड में क्रिकेट पिचों पर मौसम और मिट्टी के प्रभाव का लंबे समय से वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता रहा है। क्रैनफील्ड यूनिवर्सिटी और ECB से जुड़े शोधों में पिच रोलिंग को केवल ग्राउंड स्टाफ के अनुभव तक सीमित रखने के बजाय इसे वैज्ञानिक तरीके से समझने पर जोर दिया गया।
रिसर्च में मिट्टी की नमी, उसके सूखने, घास की जड़ों, रोलिंग के दबाव और गेंद के उछाल के बीच संबंध को समझने पर ध्यान दिया गया। इसी तरह की आधुनिक सोच अब क्रिकेट मैदानों की तैयारी में भी इस्तेमाल की जा रही है।