आंखों का खास ख्याल रखे मॉनसून में

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नई दिल्ली : जब भी मानसून का मौसम आता है तो मन खुश हो जाता है, गर्मी से निजात, रिमझिम फुहारों से खुशगवार मौसम, बारिश की छटा ही निराली होती है। लेकिन मानसून के सीजन में आखों की विशेष देखभाल भी जरूरी होती है। तरह तरह के आंखों के संक्रमण इस ही मौसम में पनपते है।

बच्चें एवं स्कूल कॉलेज जाने वाले छात्रों को विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि उनमें ही संक्रमण अधिक फैलता है। नई दिल्ली स्थित सेंटर फार साइट के निदेशक डा.महिपाल सचदेव का कहना है कि सितम्बर तक की गर्मी में काफी उमस एवं धूप तीखी होती है। इन महीनों में दोहरा मौसम होता है अर्थात् वर्षा एवं गर्मी का मिला-जुला मौसम रहता है। जिसके कारण मानव शरीर का सबसे संवेदनशील अंग आंख जल्दी बाहरी वातावरण के उतार चढ़ाव झेलती है।

प्रदूषण भरे वातावरण एवं भागदौड़ की जिंदगी में लोगों द्वारा आंखों की देखभाल के प्रति लापरवाही बरती जाती है। बरसात में होने वाली सामान्य इंफेक्शन होते है जैसे कि कन्जकटीवाईटिस, स्टाई, कॉर्नील अल्सर आदि।
डा.महिपाल सचदेव का कहना है कि बरसात में इन बातों का ख्याल रख कर बचा जा सकता है जैसे कि कंजक्टिवाइटिस होने पर डाक्टर की सलाह जरूर लें। आखों को दिन में तीन से चार बार धोएं। घरेलू उपचार में समय गंवाने के बजाए डाक्टर की सलाह लें। घर के बाहर निकलने से पहले धूप का चश्मा लगाएं।

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मॉनसून के दौरान, कन्जकटीवाईटिस और स्टाई आखों की इंप्रेक्शन से लोग अधिक पीडि़त हो रहे है। इसका इंप्रक्शन रोजाना के सामानों के इस्तेमाल से आसानी से फैलता है जैसे तौलिया, रूमाल, लैंसिस, चश्मा और अन्य सामान जो एक हाथ से दूसरे हाथ जाते है। आखों में दवा डालने के पहले और बाद में हाथों को अच्छी तरह धो लें। बार-बार अपनी आखों को हाथ से न छुएं।

आंखों को हमेशा साफ  और ठंडे पानी से धोएं। आंखों को हाथ से नहीं रगडऩा चाहिए। कम रोशनी में पढ़ाई न करें। आख में कुछ गिर जाने पर उसे मले नहीं। उसे साफ  पानी से धुले। आराम न मिले तो तुरंत चिकित्सक की सलाह लें।


डा.महिपाल सचदेव के अनुसार रोग की प्रारंभिक व्यवस्था आरंभ होते ही तुरंत नेत्र रोग विशेषज्ञ की राय लें। बिना डॉक्टरी सलाह लिए कोई दवा न लें। साथ ही मेडिकल स्टोर से स्टेरायड वाली दवा न लें। आंखों का तेज रोशनी से बचाव करें। आंखों को तेज रोशनी से होने वाली परेशानी से बचने के लिए आंखों पर गहरे रंग का शीशे वाला धूप का चश्मा पहनना चाहिए।

आंखों को पट्टी बांधकर बंद नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे आखों से निकलने वाले पानी की स्वतंत्र निकासी रूक जाती है तथा पट्टी बांधने से हुई गर्मी आंख में इन्फेक्शन को और बढ़ावा देती है। इस रोग की चिकित्सा केवल दो बातों पर निर्भर करती है, पहली किसी उचित विसंक्रामक द्रव से आंखों की बार-बार सफाई एवं दूसरी आंखों में सेकेन्डरी इन्फेक्शन को रोकने के लिए एंटीबायोटिक का प्रयोग। इसका प्रमुख कारण आंखों से निकलने वाले हानि कारक पदार्थों को धोना है। इस तरह आंखों को तब तक धुलना चाहिए जब तक कि आंखों से निकलने वाला पदार्थ कीचड़ पूरी तरह से साफ  न हो जाए।

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