इलाज से बेहतर है बचाव : डॉ. संजीव गुलाटी

डॉ. संजीव गुलाटी मोटापा

मोटापे से प्रभावित लोगों में संभावित हाइपरफिल्टरेशन का कंपेंसेट्री मैकेनिज्म होता है

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दिल्ली अप-टु-डेट

मोटापा ऐसी बीमारी है जो एक साथ कई अंगों को प्रभावित करता है। सबसे अधिक असर हृदय और किडनी पर पड़ता है क्योंकि उन्हें अधिका काम करना पड़ता है और बड़े शरीर के लिए अधिक खून, पानी और ऑक्सीजन का प्रसंस्करण करना पड़ता है। मोटापा किडनी की बीमारी के बढऩे का संभावित खतरा है। इससे डायबिटीज और उच्च रक्तचाप जैसी क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) के लिए जोखिम का सबसे बड़ा कारण है।

मोटापे से प्रभावित लोगों में संभावित हाइपरफिल्टरेशन का कंपेंसेट्री मैकेनिज्म होता है जिससे शरीर के बढ़ते वजन की अधिक मेटाबॉलिक जरूरत को पूरा किया जा सके। इंट्राग्लोमर्यूलर दबाव में बढ़ोतरी से किडनी के ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है और लंबी अवधि में सीकेडी विकसित होने का जोखिम बढ़ जाता है।

नई दिल्ली स्थित फोर्टिस फ्लाइट लेफ्टिनेंट राजन ढल हॉस्पिटल के नेफ्रोलॉजी विभाग प्रमुख एवं निदेशक डॉ. संजीव गुलाटी का कहना है कि मोटापा जोखिम की कई ऐसी वजहों के साथ जुड़ा हुआ है जो किडनी स्टोन का खतरा बढ़ाते हैं। शरीर के बढ़ते वजन के साथ कम पेशाब और बढ़ती यूरिनरी ऑक्सलेट, यूरिक एसिड, सोडियम और फास्फेट एक्सक्रिशन जैसी परेशानियां सामने आती हैं। प्रोटीन और सोडियम से भरपूर खानपान से एसिडिक यूरिन बढ़ जाता है और यूरिनरी साइट्रेट कम हो जाता है, इसके अलावा किडनी स्टोन का जोखिम भी बढ़ जाता है।

मोटापे की इंसुलिन प्रतिरोधक क्षमता से नेफ्रोलिथियासिस का भी खतरा हो सकता है। परिस्थिति और भी जटिल तब हो जाती है जब वजन कम करने वाली कुछ थेरेपी और हाई प्रोटीन जिम सप्लिमेंट, किडनी स्टोन फॉर्मेशन के जोखिम में सुधार करने के बजाय और परेशानियां पैदा कर रहे हैं। इसलिए अपने बीएमआई पर नजर रखना बहुत ही महत्वपूर्ण हो गया है।

डॉ. संजीव गुलाटी के अनुसार यूनिसेफ बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन, यूएनएफ पीए, यूकेएड, यूएसएड और मैकऑर्थर फाउंडेशन की ओर से पिछले पांच वर्षों में किए गए कई सर्वेक्षणों में पाया गया कि बरेली और आसपास के इलाकों में किडनी की बीमारियों का खतरा 3 फीसदी की सालाना दर से बढ़ रहा है। शुरूआत में जिसे मेट्रोपॉलिटन आबादी के लिए जीवनशैली बीमारी माना जाता था, वह मोटापा कानपुर और बरेली जैसे पहले और दूसरे दर्जे के शहरों के लोगों को भी धीरे-धीरे प्रभावित कर रहा है। इसके अलावा स्कूली बच्चों में भी मोटापे और उच्च रक्तचाप में चार गुना से अधिक बढ़ोतरी हुई है।

पुरानी कहावत बचाव, इलाज से बेहतर होता है, इस पर लागू होती है। अगर हमें अपने देश को मोटापे की महामारी से बचाना है तो हमें सेहतमंद खानपान की आदतें अपनाने और बचपन से ही अनुशासित ढंग से व्यायाम करने की आदत डालने की जरूरत है। बच्चों को जंक फूड खाने से बचने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए और उन्हें घर पर बनी खिचड़ी, फलों और सब्जियों व मेवों के साथ चपाती जैसे पारंपरिक खाने की ओर लौटने के लिए प्रेरित करें। उन्हें वीडियो गेम की दुनिया से बाहर आने और बाहर के गेम व योग जैसी चीजों में समय बिताना चाहिए।

डॉ. गुलाटी ने कहा हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि मोटापा, फोकल सेगमेंटल ग्लोमेरूलोस्केलेरॉसिस की वजह से सीधे किडनी पर असर पड़ सकता है। इंडियन सोसाइटी ऑफ नेफ्रोलॉजी सीकेडी रजिस्ट्री के डेटा से पता चलता है कि डायबिटीज और उच्च रक्तचाप मिलकर हमारे देश में सीकेडी का कारण बन रहे हैं। ये दोनों ही जीवनशैली बीमारियां हैं और अगर हमें सीकेडी की महामारी से बचाव करना है तो सेहतमंद जीवनशैली हमारे लिए सबसे अच्छा उपाय है।

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