भारत था विश्व गुरू और अब ?

India आर्यावर्त भारतीय गुरू-शिष्य

विद्वान अवगुणों को जंग लगे लोहे की तरह पीट कर साफ कर दिया करते थे

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दिल्ली अप-टु-डेट
नई दिल्ली। एक समय ऐसा था जब आर्यावर्त भारत विश्व गुरू कहलाता था और पूरे विश्व में भारत को गुरूऔ की भूमि कहा जाता था। यहां तक ही नही भारतीय गुरू-शिष्य की परंपरा दुनिया भर में प्रसिद्ध थी और समय के चलते यह परंपरा खो सी गई है।

पहले गुरू अपने शिष्यों पर बारीकी से परिक्षण करते थे और उनके अंदर विद्वान अवगुणों को जंग लगे लोहे की तरह पीट कर साफ कर दिया करते थे और उसे गुणों से भरकर एक नया आकार देते थे। जैसे लोहे को पिघलाकर उपयोगी यंत्रों को बनाया जाता है।

ठीक उसी प्रकार गुरू अपने शिष्यों को नये यंत्रों की तरह तैयार करते थे। जहां तक देखा जाए तो जिस क्षेत्र में आप जितनी मेहनत करते है उस क्षेत्र के आप खुद उतने ही बड़े जानकार बन जाते है और ऐसे ही शिक्षक अपने छात्रो के साथ करते है। जबकि शिक्षकों को अपने अपने सवालों का जवाब ब्लैक बोर्ड पर देना होता है और हम ये काम कलम और कागज के माध्यम से आप लोगो के सामने प्रत्यक्ष रूप से रख रहे है।

ऐसा इतिहास बताता है एक जमाने में भारत विश्व गुरू था और अब ऐसा महसूस होने लगा है कि भारत को दोबारा विश्व गुरू बनने एवं परंपरा को फिर जीवित करने की जरूरत है। हम आपको यह भी बतायेंगे कि शिक्षक और गुरू के बीच क्या अंतर होता है। शिक्षक आपको जानकारियां देते है परिभाषाएं समझाते है और आपको विषय एक्सपर्ट बनाने की कोशिश करते है। आपकी बौद्धिक क्षमता के आधार पर आपको अंक देते है।

लेकिन गुरू आपको जीवन की शिक्षा देते है और गलत सही का बोध कराता है। गुरू के पास जाने वाला शिष्य जिंदगी की परीक्षाऔ में पास या फैल होने के आधार पर आकलन नही करता बल्कि गुरू के पास जाने वाला शिष्य रूपांतरित हो कर लौटता है। क्योंकि गुरू पहले व्यक्ति के अवगुणों को मिटा कर फिर से नया का निर्माण करते है।

इससे यह समझा जाए कि गुरू ही सही मायने में गुरू ही समाज के व्यक्तित्व का निर्माण करता है और जहां तक देखा गया है कि अच्छे गुरू और वेस्ट शिक्षकों के बिना सभ्य समाज और श्रेष्ठ समाज की कल्पना नही की जा सकती है। यह सब कुछ बहुत सुंदर और सपनों जैसी बात लगती है।

लेकिन इसकी बात करे तो आज हम कुछ सवालों के जवाब ढूंढ रहे है देश के भविष्य का निर्माण करने वाले शिक्षकों का वर्तमान कैसा है और वह कैसे इतना बड़ा काम रहा है और इन्हें इस काम के बदलें क्या मिलता है और आप का अब पूरी शिक्षा व्यवस्था को शिक्षको की नजर से देंखेगे और एक समय पहले किसी एक जमाने में प्राचीन भारत के नालदा एवं तक्षशिला और विक्रम शिला जैसे विश्व विद्यालयों से ज्ञान का जो सूर्य निकलता था उससे पूरा विश्व रोशन होता था।

तक्षशिला विश्व विद्यालय के कुछ प्रसिद्ध छात्र थे। आयुर्वेद के जनक-चरक व्याकरण के जनक पाणिनी अर्थशास्त्री और दर्शनिक चाणक्य और सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य तथा चीन के महान दार्शिक (हवेन व्सांग) ने नालदा में अपने गुरू शैलभद्र को अतुलनीय बताया था। यहा तिब्बत, चीन, कोरिया और इंडोनेशिया जैसे देशो से भी छात्र शिक्षा ग्रहण करने आते थे और भारत की गुरू-शिष्य परंपरा दुनिया में अपने कही खो गई और भारत को फिर विश्व गुरू बनने की जरूरत है और फिर उस परंपरा को जीवित रखने की सख्त आवश्यकता है।

शिक्षा एक ऐसा पेशा है जो बाकी सभी पेशो को जन्म देता है। आप भी स्कूल या काॅलेज से पढ़कर निकले है लेकिन इसके बाद भी आपने शिक्षक बनने की नही सोची होगी। इसकी वजह यह है कि शिक्षक बनने में कोई ग्लेमर है पैसा नही है तो आखिर ऐसा क्या है इस सवाल के जबाव के लिए आप आपके साथ मिलकर ढूंढना चाहते है।

हम कुछ आकड़ों की मदद से जानकारी निकालते है। जैसा की वर्तमान समय में देश में 50 प्रतिशत से ज्यादा आबादी 25 साल से कम नही है। ऐसा अनुमान है कि 2020 तक भारत की औसत आयु 29 साल होगी। जबकि भारत के पास युवा आबादी वाला शक्ति कुंज है और आबादी को अगर अच्छी शिक्षा नही मिली तो यह शक्ति कुंज एक ज्वाला मुखी में बदल सकता है।

इस युवा आबादी को शिक्षित करने की जिम्मेदारी शिक्षकों की है और पूरे देश में शिक्षको की भारी कमी है। आज के दौर मे लोग शिक्षक बनना नही चाहते और अपने बच्चो को भी कुछ और बनाना चाहते है। 2018 के सरकारी आंकड़ो के हिसाब से देश में 10 लाख शिक्षकों के पद खाली है। ज्यादातर आबादी गांवों में रहती है और वहा पर फोक्स करने की जरूरत है। लेकिन ऐसा नही हो रहा है शिक्षा में सुधार को देश की सबसे बड़ी मुहिम माना जाना चाहिए।

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