अन्य धर्मो में भी देखने को मिल र​हे है कृष्ण के अनुयायी

कृष्ण जन्माष्टमी

कृष्ण जन्म महज एक पर्व ही नही अत्याचारियों को एक संदेश

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दिल्ली अप—टु—डेट
आमतौर पर जन्माष्टमी का पर्व एक जयन्ती अथवा एक धर्म की आस्था को लेकर मनाया जाता है, लेकिन ऐसा नही है आधुनिकीरण ने इतना परिवर्तन है कि एक बड़े रहस्य में इतनी आधुनिकी भर दी है। हर कोई जन्माष्टमी के बारे में पूछे जाने पर इतना छोटा जवाब दे देता है कि इस दिन कृष्ण भगवान का जन्म हुआ था। जबकि यह जन्म साधारण जन्म नही था। इसके पीछे एक बड़ा कारण रहा है। मथुरा के राजा अग्रसेन के एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम कंस रखा गया था।

वैसे पुराणों में अनेक तथ्य बताये जाते है जिससे जन्मे बच्चे के भाव गुण दोषो का आकलन अनुमान लग जाता है कि यह नौजवान होने पर कैसे कार्य करेगा। धार्मिक या आधार्मिक ऐसे ही कंस जन्म के पश्चात राजा अग्रसेन ने भी विद्वानों को बुलाकर जन्में बच्चे का नामकरण कराया तथा भविष्यवाणी के बारे में जाना तो विद्वानों ने कंस को बड़े दुष्ट स्वभाव वाले व्यक्ति की संज्ञा दी थी और कंस वैसा ही निकला। उसने अपना होश संभालते ही अत्याचार प्रारंभ कर दिया था तथा भगवान की पूजा उपासना करने वाले संतो पर भी घोर अत्याचार करता था और युवा अवस्था में ही उसने अपने माता पिता का सिंहासन छीन कर स्वयं ही राजा बन बैठा था। उसके द्वारा किये जा रहे अत्याचारों से हा हा कार मच गया था।

हर कोई परेशान था इसी बीच एक घटना घटित होती है। एक दिन कंस अपनी चचेरी बहन की शादी कर उसे बड़े धूम-धाम से उत्साह पूर्वक विदा कर रहा था कि अचानक आकाशवाणी होती है कि हे कंस आज जिस बहन को तू बड़ी धूम-धाम के साथ विदा कर रहा है देखना एक दिन इसके गर्भ से जन्में आठवें पुत्र से तेरी मृत्यु होगी। इस वाणी को सुनकर कंस आश्चार्यक्ति रह गया तथा उसने तुरंत ही अपनी बहन देवकी और उसके पति वासुदेव को कैद खाने में डलवा दिया। कुछ दिन बाद देवकी ने कैद खाने में अपने प्रथम बच्चे को जन्म दिया।

जिसे कंस ने नारद मुनि के कहने पर मृत्यु के घाट उतार दिया। ऐसे ही कंस ने अपनी बहन देवकी के एक-एक कर जन्मे सातों बच्चों को मौत के घाट उतार दिया और उसका निरंतर अत्याचार भगवान के भक्तों पर बढ़ता रहा और इन सब कारणों के चलते भगवान विष्णु ने आठवें बच्चें के रूप में देवकी के गर्भ से जन्म लिया। पुराणों के अनुसार कृष्ण जन्म भाद्रपद मास की अष्टमी को हुआ था तथा जन्म लेने के बाद भगवान ने वासुदेव को आदेश दिया कि उनके लालल-पालन के लिए वह अपने मित्र नंद के यहा नंदगांव में छोड़ दें, वासुदेव ने ऐसा ही किया।

वासुदेव तुरंत ही नवजात शिशु को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े अथाह यमुना को पारकर नंद के यहा पहुंचे और वहा से नवजात कन्या को लेकर मथुरा आ गये। जब कंस को सूचना मिली के देवकी के आठवें गर्भ से बच्चे ने जन्म ले लिया है और उसने वासुदेव-देवकी के हाथ से उस नवजात कन्या को लेकर जमीन पर पटकना चाहा कि कन्या हाथ से छूट गयी और बोली मूर्ख कंस मुझे मारने से क्या होगा। तुझे मारने वाला वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दण्ड देगा। यह सुनकर कंस का पारा आठवें आसमान पर जा पहुंचता है और बालक कृष्ण को मारने के लिए तरह-तरह के प्रयास करने लगा।

लेकिन कंस का कोई प्रयास सफल न हो सका। अंत में भगवान कृष्ण जब युवा अवस्था में पहुंचे तो उन्होंने कंस का वध किया और अपने भक्तों के दुख का निवारण किया तथा अपने नाना अग्रसेन को फिर मथुरा का राजा बनाया इस प्रकार से कृष्ण जन्म यह याद दिलाता है कि कृष्ण जन्म महज एक पर्व ही नही बल्कि अत्याचारियों को एक संदेश है कि समय रहते सारे गलत कार्य छोड़ दो और बिना किसी वजह लोगो अथवा गरीबों पर अत्याचार मत करो।

अन्यथा एक दिन उन अत्याचार सहने वाले मनुष्यों में से कोई न कोई कृष्ण जरूर बनेगा और तुम्हारी राज शाही गुंडागर्दी के साथ-साथ तुम्हारे पूर्ण स्वराज्य का अंत कर देगा। कृष्ण जन्माष्टमी से यह सीख लेना बहुत ही अहम है क्योंकि अच्छे बनने के लिए सभी व्यक्तियों को प्रत्येक समाज धर्म अथवा जाति के प्राणियों के साथ समानता एकता तथा दयालुता का व्यवहार करना चाहिए। जिससे एक प्रेम उपजता है और सम्पूर्ण मानव जाति के लिए यह ही सबसे महत्वपूर्ण है।

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