घोषणाएं तो बहुत की, अब वक्त है उन्हें पूरा करके दिखाने का

घोषणाएं लोकतंत्र विधानसभा चुनावो

घोषणाएं तो बहुत की, अब वक्त है उन्हें पूरा करके दिखाने का

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नई दिल्ली। लोकतंत्र की यह विशेषता है कि सत्ता की ताकत और भारी−भरकम संगठन के बल पर किसी को दबाया नहीं जा सकता इसका उदाहरण हमे दिल्ली के विधानसभा चुनावो मे भी देखने को मिला। केन्द्र मे भाजपा सरकार और उसके मजबूत संगठन के बावजूद आम आदमी पार्टी को दिल्ली में फिर से सत्ता पर काबिज होने से रोका नहीं जा सका। संगठन स्तर पर तो भाजपा और कांग्रेस की तुलना में आप कहीं नहीं ठहरती बावजूद इसके भी आम आदमी पार्टी ने बाजी मार ली। ये बात अलग है कि ये चुनाव परिणाम मतदाताओं की परिपक्वता के कारण आए है या सरकारी घोषणाये व योजनाएं है जो जनता उठा रही थी।

सोशल मीडिया पर भी भाजपा ने आप के विरुद्ध जितना जहर उगला, उसके छींटे आम आदमी पार्टी पर नहीं पड़े। चुनाव बेशक दिल्ली में हुआ हो असल मे तो ये चुनावी जंग सोशल मीडिया पर ही लड़ी गई। आप का नेटवर्क तो सोशल मीडिया पर नजर ही नहीं आया। भाजपा समर्थकों ने सोशल मीडिया पर पूरा कब्जा कर लिया। इसके बावजूद अरविन्द केजरीवाल को सत्ता में आने से रोकने के तमाम प्रयास विफल साबित हुए।

इस पूरी चुनावी जंग में कांग्रेस के बारे में तो पहले ही कयास लगाया जा चुका था कि कांग्रेस अपना सब कुछ पहले ही लुटा चुकी है। चुनावी टक्कर यदि होगी तो आप और भाजपा की बीच में। इसमें आप एकतरफा साबित हुई। केन्द्र सरकार और भाजपा नेताओं ने अरविन्द केजरीवाल को चुनौती में देने में सारा दमखम लगा दिया, फिर भी सत्ता भाजपा के हाथ से फिसल गई। चुनाव की इस तस्वीर से यह भी स्पष्ट हो गया कि मतदाता चाहे दिल्ली के हों या झारखंड के, उन्हें प्रदेश के विकास से मतलब है।

राजनीतिक दल सियासी फायदे के लिए क्या−क्या मुद्दे उठाते हैं, उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं हैं। यही वजह रही कि मतदाताओं ने सीएए और एनआरसी, अयोध्या जैसे मुद्दों के बजाय दिल्ली के क्षेत्रीय विकास को प्राथमिकता दी। इसे विकास की जीत कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। गौरतलब है कि भाजपा ने भी लोकसभा चुनाव लड़ा विकास के साथ राष्ट्रवाद के मुद्दे पर लड़ा था। आप ने लगातार तीसरी बार दिल्ली में सत्ता हासिल करने के बाद देश में चुनाव लड़ने के समीकरण बदल दिए हैं। जाति, धर्म, सम्प्रदाय या ऐसे ही दूसरे सतही मुद्दों पर अब चुनाव लड़ना आसान नहीं है।

राजनीतिक दलों को हकीकत में यह साबित करना पड़ेगा की पांच साल सत्ता में रहने के बाद उन्होंने क्या किया। उन्हें आम लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना पड़ेगा। यही अब सबसे बड़ा पैमाना होगा। यही वजह रही कि आप के पास गिनाने के लिए काफी कुछ था। इसके विपरीत भाजपा सिर्फ आरोप−प्रत्यारोपों तक सीमित रही। भाजपा केंद्र में आठ महीने के शासन का लेखा−जोखा मतदाताओं के सामने नहीं रख सकी। जबकि अमित शाह सहित तमाम मंत्रियों ने आप को कोसने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। कांग्रेस का भी यही हाल रहा। जिन राज्यों में कांग्रेस सत्ता में है उन राज्यों का मॉडल भी दिल्ली में पेश नहीं कर सकी। यही कारण रहा कि कभी दिल्ली की सत्ता पर लंबे अर्से तक काबिज रही कांग्रेस एक सीट के लिए भी तरस गई। राजनीतिक इतिहास में कांग्रेस की इससे बुरी दुर्गति शायद ही कभी हुई हो। चुनाव परिणामों में शून्य पर रहने के बाद भी कांग्रेस मुगालते पाले हुए है। लोकसभा चुनाव में भाजपा के हाथों करारी शिकस्त खाने के बाद भी कांग्रेस ने भूल सुधार नहीं की। 

कांग्रेस चाहती तो दिल्ली के विधानसभा चुनाव में कुछ हद तक इसकी क्षतिपूर्ति कर सकती थी। कांग्रेस शासित अन्य राज्यों के कामकाज और उपलब्धियों को मतदाताओं के सामने रोल मॉडल की तरह पेश कर सकती थी। इससे कांग्रेस के पास वोट मांगने का एक आधार बन जाता। इसके विपरीत कांग्रेस सीएए और एनआरसी, शाहीन बाग जैसे मुद्दों में उलझ कर रह गई।

कांग्रेस यह भूल गई कि विगत चुनावों तक भाजपा ने भ्रष्टाचार को लेकर जो बखिया उधेड़ी थी, उसकी कुछ भरपाई करनी है। इसके विपरीत कांग्रेस शासित राज्य देश के सामने कोई नई तस्वीर पेश करने की बजाए भ्रष्टाचार और गुटबंदी में उलझे रहे। दिल्ली के चुनाव परिणामों से कांग्रेस के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारी भरकम कैडर वाली भाजपा को भी भविष्य की राजनीति के लिए नए सिरे से आयाम गढ़ने होंगे। अब केवल भावनात्मक मुद्दों के सहारे सत्ता की सीढ़ियां चढ़ना आसान नहीं है।

भाजपा गुजरात के अलावा किसी भी दूसरे राज्य को मॉडल राज्य की तरह प्रचारित नहीं कर सकी। इस मॉडल को भाजपा ने कई चुनावों में भुनाया है। देश के मतदाताओं को यह उम्मीद रही कि भाजपा दूसरे राज्यों में भी विकास की गुजरात जैसी लकीर खींचेगी। इसके विपरीत भाजपा शासित एक भी राज्य राष्ट्रीय स्तर पर विकास का परचम नहीं फहरा सका। भाजपा को समझना होगा कि व्यर्थ के विवादों में पड़ने की बजाए विकास को ही आधार बनाकर भविष्य की राजनीति तय की जा सकती है।

अब आप के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। मुफ्त सुविधाओं की जो घोषणाएं की हैं, पर्याप्त वित्तीय संसाधनों के इंतजाम के उन्हें पूरा करना संभव नहीं है। इन घोषणाओं के लिए केंद्र सरकार से वित्तीय मदद की अपेक्षा और उम्मीद करना बेमानी होगा। इसके लिए दिल्ली की नई सरकार को केन्द्र से तालमेल बनाकर ही चलना होगा और उससे भी बड़ी बात कि भाजपा के केन्द्र सरकार दिल्ली की नई सरकार को कितनी तरजीह देगा?  —नरेन्द्र धवन

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