जल की शुद्धता बहने में है मनुष्य की चलने में

Is of the age of civilizations

मनुष्य के अंदर अवगुण रूपी व अज्ञान रूपी अंधकार

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दिल्ली अप-टु-डेट

पुरानी कहावते भी कही न कही बहुत ही सटीक निकलती है और वह एक जीता जागता सबूत भी है। लेकिन आज भी आधुनिक युवा पीढ़ी उसे मानने को तैयार नही है। युवा पीढ़ी की बात ही छोड़ियें वह पुरूष भी जो वर्तमान समय में 40 से 65 वर्ष की उम्र के है। लेकिन उन्हें यह ज्ञान नही है कि जब आप पुरानी सभ्यताओं को तवज्जो नही देंगे तो क्या आप के बच्चे तुम्हारे द्वारा बताई बात या दिए गयें निर्देशों का पालन करेंगे। ऐसा वह कभी नही कर सकते है। क्योंकि वह संस्कार ही उनके अंदर उत्पन्न नही हुए है और वे आधुनिकता के शिकार है। इसलिए प्रयोंग कर के ही आगे चलना चाहते है। ठीक उसी प्रकार एक पुरानी कहावत है कि जल को स्थिर अवस्था में एक जगह भरा रहने दो उसकी शुद्धता का पतन हो जायेंगा एवं हो जाता है। ऐसा माना जा रहा है जैसे कि अगर आप तालाब का पानी देखेंगे तो निश्चित ही वह बदबूदार होगा। जिस प्रकार जल एक जगह पर रूके रहने से दूषित हो जाता है। ठीक उसी प्रकार मनुष्य है वह भी अगर एक स्थान पर रहेगा तो उसमें भी प्रदूषित गुण भर जायेंगे। जो इंसान ठहर गया, उसे प्रदूषित होना ही है और जो चलता रहा है वह महामानव माना गया है। चाहे वह कबीर हो, लेखक हो, कवि या साधु ऐसी तमाम सभ्यताएं है जो इंसान के चलने की वजह से पटल पर उभरी है। इस बात की गहराई को समझना बहुत जरूरी हो जाता है। व्यक्ति को सदैव इधर-उधर के काम को छोड़कर अपने काम पर ध्यान देना चाहिए। अगर ऐसा नही कर सकता है तो इंसान की अनेक दिशाओं में फेल रहने के कारण उसका अस्तित्व खत्म हो जाता है। जो अपने काम अथवा लक्ष्य के लिए चला है। वही चलेगा बाकी सब तो ठहरकर नष्ट हो जाते है। दूसरी गौर करने की बात यह भी है कि इंसान को चलना चाहिए और चलना अति आवश्यक बन जाता है क्योंकि चलने से ही मनुष्य के अंदर अवगुण रूपी व अज्ञान रूपी अंधकार बहकर खत्म हो जाता है। चलने वाले मनुष्य ही सभी विचारों को सुनते है। तमाम जगह को देखते है फिर उन्ही विचारों को तर्क पर तौलकर फिर एक नया विचार देगा। इसलिए मनुष्य की प्रकृति भी चलना है। जब भी कोई बदलाव की ब्यार चलेगी तो खुद को चलना होता है। इससे सिद्ध होता है कि चाहे वह पानी हो अथवा दिमाग व मनुष्य या गाड़ी का पहिया जब चलता है तभी बदलता है। ठीक इसी प्रकार जो मनुष्य के चलने का विज्ञान समझता है वह नदी के बहने का विज्ञान समझ सकता है। क्योंकि जब व्यक्ति किसी बहते हुए पानी को बांधता है। वह पानी नदी, झील अथवा झरना किसी का भी हो एक किनारा खुला भी छोड़ता है। क्योकि सभी को पता है कि पानी खुद बहकर अपना किनारा ढूंढ लेगा। ठीक पानी की तरह ही मनुष्य को भी अपने लिए एक किनारा छोड़ना होगा। ताकि वह निर्वाध सोच सके। तर्क करे खुद उसमें उलझे सिकुड़े और फिर अपना रूप लें। अगर मनुष्य को दोनो तरफ से कसकर रख लिया। उसे चलने से रोक दिया तो वह निश्चित ही गुलाम हो जायेंगा और गुलाम कभी बिना हुकुम निर्वाहा के चल नही सकता है। स्वतंत्र सोच नही सकता तो प्रदूषित होकर शिसक शिसक कर उसे भी नष्ट ही हो जाना होता है और गुलाम प्रवृति व आलसी कमजोर व्यक्ति ठीक तालाब के ठहरे पानी की तरह होते है और न उन अपने का ही कुछ करते है। सिर्फ उसका मनोबल तोड़ने के अलावा उनका दूसरा कोई काम नही होता है। फिर भी वह विकसित होना चाहते है। जब कभी ठहरे पानी निर्मल नही रह सकता है तो ठहरा व्यक्ति ज्ञानवान कैसे हो सकता है और कभी भी विकास नही कर सकता है। उसे तो सिर्फ ऐसे ऐशो आराम की जरूरत होती है जैसे पानी रूकता है तो उसमें गंद जमा होता है और मनुष्यों के रोकने पर उनमें सिर्फ आलस्य जमा होता है और फिर वह मनुष्य आलस्य का गुलाम बनकर रह जाता है। इसलिए सभी मनुष्यों को अपने लिए एवं नदी के लिए एक समान रूप से सोचना चाहिए और इसलिए ही प्रकृति ने दोनो को अपनी अशुद्धिया दूर करने का गुण स्वयं में दिया है। बहती हुई नदी शुद्ध रहेगी और चलता हुआ मनुष्य ही शुद्ध विचार दे सकता है। स्थिर व्यक्ति सिर्फ चापलूसी अज्ञानता व मूर्खता को बढ़ावा दे सकता है न कि किसी महत्वपूर्ण ज्ञान को क्योंकि उसका ज्ञान ही स्थिरता व आलस्य चापलूसी का ही है। इसलिए सभी को कदम से कदम मिलाकर चलते रहना चाहिए।

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