स्वदेश में अंग्रेजी विदेश में हिन्दी

हिन्दी भाषा दक्षिण भारत प्रधानमंत्री मोदी

मुख्य भाषा को हिन्दी भाषा का ही नाम दिया जाता

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क्या है यह फोदी फंडा?

दिल्ली अप—टु—डेट
भारत की पहचान विश्व भर में हिन्दी भाषा को लेकर है और सम्पूर्ण भारत के लगभग 80 प्रतिशत लोग हिन्दी भाषा को ही बोलते है। जबकि पूरे विश्व में भी भारत की मुख्य भाषा को लेकर चर्चा आती है तो मुख्य भाषा को हिन्दी भाषा का ही नाम दिया जाता है तथा काम काज एवं पत्राचार की भाषा भी हिन्दी ही है। हालांकि अंग्रेजी को भी यूज में लाया जाता है।

लेकिन देश के अंदर हजारो उप भाषाएं बोली जाती है। उन उपभाषाओं के बाद अगर सबसे ज्यादा बोली समझी जाने वाली भाषा है तो वह प्रथम स्थान पर हिन्दी ही है। क्योंकि दक्षिण भारत के कुछ भाग को छोड़कर भारत के सभी राज्यों में सबसे ज्यादा हिन्दी भाषा का ही महत्व व स्थान है। शायद इसलिए ही सबसे ज्यादा और विश्व भर में भारत को हिन्दी भाषी राष्ट्र माना जाता है।

अभी हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री मोदी हाउडी मोदी कार्यक्रम में शिरकत करने अमेरिका गये थे। वहा वह भारतीय समुदाय के लोगो को संबोधित कर रहे थे तो सम्बोधन की भाषा हिन्दी थी। जबकि विदेश मतलब दूसरे देश में निवास कर रहे भारतीय समुदाय के लोग अंग्रेजी भाषा समझते है। शायद तभी वह लोग वहा अपना जीवन यापन कर रहे है और रोजगार पा रहे है।

क्योंकि अमेरिका में हिन्दी भाषा को बहुत कम ही लोग समझते है। ज्यादातर वहा पर अंग्रेजी भाषा का ही प्रभाव देखने को मिलता है तो प्रधानमंत्री मोदी ने वहा पर अपने सम्बोधन को हिन्दी में क्यों जारी रखा। यह समझ नही आ रहा है। शायद इसलिए कि वह देश का मान बढ़ा रहे है और उन्हें हिन्दी भाषा से बहुत ही प्रेम है।

मोदी पूर्ण रूप से कट्टर वादी हिन्दी भाषी है। ऐसा मानना सही नही है जबकि भारत आगमन के बाद वह आईआईटी चेन्नई तमिलनाडु के एक समारोह मे सम्बोधन में अंग्रेजी भाषा में जारी रखते है। जबकि देश के अंदर ज्यादातर लोग हिन्दी भाषी है फिर मोदी ने स्पीच को अंग्रेजी भाषा में ही दिया। इसको कई राजनीतिज्ञ तो राजनीतिज्ञता से जोड़ रहे है।

मोदी के इस उद्धघोषन को कि शायद इसलिए मोदी ने ऐसा किया है कि वह अपने देश के जन समूह को भाषा के मामले में एक नही कर पा रहे है और भारत के ही कुछ आस्तीन रूपी सांप भाषाओं को लेकर एकता में विध्वंस मचाये हुए है। इन तथ्यों से बखूबी अंदाजा लगाया जा सकता है कि शायद आईआईटी चेन्नई के समारोह में इस भाषा के दंस व द्वेश भावना के कारण ही मोदी को अंग्रेजी भाषा में संबोधन करना पड़ा।

क्योकि ज्यादातर दक्षिण भारत के राज्यों के लोगो ने ही हिन्दी भाषा को लेकर विरोध जताया था। लेकिन इसे मोदी की कुशल राजनीति कहना ठीक नही है। शायद ऐसे दोहरे व्यवहार के कारण ही आज हमें कश्मीर राग खटक रहा है और देश के वीर सपूत शहीद हो रहे है। इसलिए ऐसी राजनीति का त्याग कर मोदी जी को आईआईटी चेन्नई मद्रास मंे भी हिन्दी में ही समारोह केा सम्बोधित करना चाहिए था।

जब हम विश्व के अंदर घूम-घूम कर चारो दिशाओं हिन्दी बोल सकते है तो किसी को कोई परहेज नही है और आज देश के अंदर हम अलग-अलग क्षेत्रीय भाषाओं का बोलेंगे तो विद्रोह भी हो सकता है और गृह युद्ध भी तो इस युद्ध पर काबू पाना शायद बहुत ही मुश्किल होगा। इसलिए जनता के मशीहा बनकर उनका अपार जनसमर्थन पाकर कुर्सी पाने वाले नेताओं को इस प्र्रकार का रवैया अपना बेहद ही निन्दनीय है। साथ ही साथ चिंत्ताजनक भी है।

लेकिन राजनीति इतनी गंदी होती जा रही है कि उन्हें पद मिलें चाहे कोई हथकंडा अपनाना पड़े यह सोच तुच्छ एवं बड़ी भद्धी सोच है। जहा तक मोदी ने अमेरिका में सबसे ज्यादा शब्दों का इस्तेमाल हिन्दी भाषा में ही किया। लेकिन उन्होने एक ही शब्द कई भाषाओं में भी बोला वह प्रशंनीय है लेकिन देश के अंदर अंग्रेजी और विदेश में हिन्दी यह दोहरी राजनीति गलत है। जो किसी बड़े ओहदे वाले पदासीन व्यक्ति को शोभनीय नही है।

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