बंजारे समाज भी अधिकारों से वंचित ?

बंजारा समाज कला संस्कृति

बंजारो का निवास बंजर भूमि चारागाह अथवा ग्राम समाज की जमीने

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दिल्ली अप—टु—डेट
नई दिल्ली। बंजारे मानव के द्वारा जाति प्रथा के अंतर्गत जाति आकलन या जाति नामकरण में ऐसे समुदाय जो घुमंतू होते थे। उन्हें बंजारा नाम दिया गया था और पूर्व में आजतक उनके ठहरने या रहने का कोई निश्चित स्थान नही होता है। वह धीरे-धीरे पूरे देश का भ्रमण करते करते अपना व्यापार करते थे और अधिकतर बंजारो का निवास बंजर भूमि चारागाह अथवा ग्राम समाज की जमीने पर डेरे लगा कर होता था।

यह लोग देश के अनेको गांवो में घूमकर व्यापार करते थे तथा किसी एक गांव में अपना डेरा लगा देते थे और उस गांव अथवा नगर के चारो तरफ के इलाको में घूमकर व्यापार करते थे। इसके उपरांत दूसरे शहर अथवा राज्य या गांव में जाकर फिर डेरे लगा देते थे और इसी प्रकार पूरे देश में वह वर्षो घूमकर बिता देते थे तथा इनके साथ में इनका पूरा परिवार रहन-सहन का सामान तथा जरूरत की वस्तुओ के साथ मवेशी जिसमें भेड़ बकरी, बैल, गाय, भैस आदि रखते थे।

इन्हें बेचना खरीदना इनका प्रमुख धंधा अथवा व्यापार होता था तथा यह अनेक प्रकार के खेल तमाशे इत्यादि दिखाते थे। पूरी जिंदगी घूमकर कर व्यतीत करने वाले परिवार कृषि और व्यापारिक गातिविधियों से लेकर मौखिक इतिहास की परंपराओं कला संस्कृति के विभिन्न पक्षो तक को व्यापकता प्रदान करते रहे है।

के द्वारा ही संस्कृति का प्रचार प्रसार हुआ तथा बंजारो के द्वारा ही हिंदूस्तान के अंदर विभिन्न जगहो पर गहरे तालाब, बावड़िया, जोहड़ बनाये गये इन सब का उपयोग वह अपनी दिनचर्या में लाते थे। उनकी महिलाओं ने टैटू गोदने की सभ्यता को बढ़ावा दिया था। वे गांव के अंदर सिल-बटने को गोदने का काम करती थी।

जिसे दांत बनाना भी गांव की भाषा में कहते है तथा इसी बंजारा समाज ने विभिन्न बिमारियों के इलाज की औषधिया सांप के जहर के लिए जड़ी बूटी बनाई। गांवो मे आटा पीसने की पत्थर की घंटी मतलब चक्यिा आधुनिक नाम आटा चक्की दी थी। कुचबंदा ने अपनी हाथो से और बाकरी ने अपने रेवड़ (बकरी, भेड़ ) से मिटटी का प्रबंधन किया।

नटो और भोया ने कला मनोरंजन के साथ समाज सुधार का जिम्मा उठाया तो ‘‘गवारीन’’ ने ग्रामीण समाज की महिलाओं की जरूरतों को पूरा किया तथा ‘‘जागा’’ ने जातियों का रिकार्ड रखने का काम किया तो कठपुतली भार ने खेल के जरिए इतिहास का वर्णन किया इसी में ओढ समाज आता है।

वह मिट्टी को समतल करता तो बाबरिया फसल रखने का काम करता है एवं गड़रिया व लुहार ने कृषि के औजार बनाकर सहायता की तो तुंगीबाल जंगल से जड़ी बूटी लेकर आये और समाज की सेवा करते रहे थे और धीरे-धीरे हमारे समाज का ढाचा बदला आधुनिकीकरण हुआ मशीनरी शुरू हुई तब इन सब प्रथाओं का अंत होता जा रहा है और मनोरंजन भी आजकल लोग मोबाइल फोन पर ही कर लेते है।

इसी आधुनिकता के कारण आज यह समाज मुफलिसी की जिंदगी जी रहे है लेकिन किसी राज्य में इनको ओवेसी तथा किसी राज्य में एससी का दर्जा दिया गया है, न तो इनके आज कोई कृषि करने हेतू जमीन है और न ही रहने के लिए मकान इनकी स्थिति बड़ी ही अस्त वियस्त है और आजादी के इतने दिन बीतने के बाद हमें यह तक पता नही है कि इन समाजो की जनसंख्या कितनी है ऐसे समाजो की स्थिति कैसी है।

जब इनके पास प्रतिभा की कमी नही है। आपने इर्द-गिर्द बखूबी देखा होगा कि नट बच्चे बच्चपन में ही रस्सी पर चलने की कला सीख जाते है एवं भोपा बच्चे भी गजल कलाकार होते है तथा पानी की समस्या से जूझ रहे राज्य बंजारे की पानी बचाने की कला से खूब ही सीख सकते है।

पानी को बचाना क्योंकि बंजारे पाने को सुरक्षित व बहुत ही सटीक ढंग से उपयोग मे लाते है तथा कालवेलिया को एंटी बेनाम बनाने वाली ड्रग फार्मा कंपनी मकें लगा सकते है तथा सिंगीबाल से जड़ी बूटी का ज्ञान लिया जा सकता है।

बांगरी और कुंचमदा से मट्टी के प्रबंधन का काम भी सीखा जा सकता है। ऐसे हम इनके अनुभव के आधार पर ही रोजगार दे पाये होते तो उनकी समस्या दूर होती और सुविधा भी सही ढ़ंग से प्राप्त हो सकती है। ऐसे ज्ञानों को हम जानबूझकर खोते जा रहे है।

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