दिल्ली फतह को लेकर असमंजस में भाजपा?

In the, every political party

असमंजस में भाजपा?

Spread the love

दिल्ली अप-टु-डेट

दिल्ली के चुनावों में किस तरह बिसात बिछे प्रत्येक राजनैतिक दल मंत्र मुद्दा मौका तलासने में लगा हुआ है। लेकिन पिछलें बीस वर्षो से ग्रहण की चपेट में आयी भाजपा भी मुकाम को हासिल करने की जुगत में लगी हुई है। हालांकि प्रयास तो प्रत्येक चुनावी समर में आप के तरीके से किए गए लेकिन सफलता प्राप्त नही कर पाई फिर भी इस बार लहर, संघ और मुद्दो के बल पर मुकाम तक पहुंचना चाहती है। आखिर यह सपना भाजपा का कितना पूरा होता है। यह तो भाजपा की किस्मत, ईश्वर का फैसला और जनता का दान ही निश्चित करेगा। उधर भगवावादी भाजपा अपने ही एक मित्र से वर्षो पुरानी मित्रता को तोड़ चुकी है और उसका असर भी पड़ना मुमकिन है। जहां दोनो के मुद्दे रास्ते एक थे और दोनो के बीच ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई। इसका किसी को भी अनुमान नही था कि ऐसा भी हो सकता है। फिर राजनीति में कोई बड़ा-छोटा होता ही नही है। दांव पेच चलते है मौके मिलते है और खिलाड़ी वही है जो उन मौके अवसरो का लाभ उठा सके।

कैसे जीते जनता का दिल?
वही बादशाह है यह तो राजनीति है। इसी आपसी फूट का असर कही अधिक न पड़ जायें। इसको कम करने के लिए दिल्ली के चुनावों में संघ भी स्थिति को परखने में जुटा हुआ है और अधिक सक्रयता को बढ़ाने में जुटा हुआ है। संघ को चिंता इस बात की भी है कि जब आपसी मतभेद बढ़ते है तो उसका नुकसान तो होता है चाहे बहुत कम मात्रा में ही क्यों न हो। लेकिन दिल्ली की कुर्सी का चुनावी संग्राम बहुत ही उलझता चला जा रहा है। एक तरफ तो 20 वर्षीय अज्ञातवास, दूसरा मौजूदा सरकार की मुफ्त योजनायें, तीसरी बात कांग्रेस की सक्रियता तो चैथा शिवसेना से मतभेद बीजेपी के लिए चुनोती पूर्ण बना हुआ है। आखिर इन सब से पार पाने के लिए बीजेपी कौन सी अमोघ शाक्ति चलायेगी। जिसके प्रयोग से इस सब का हल निकलेगा यह विचार योग्य है शायद संघ इस पर विचार कर चुका है और समीकरण साधने की जुगत में लग गया है। संघ की सक्रियता का बढ़ना भी अहम समझा जा रहा है। संघ के कुछ नेताओं ने राष्ट्रीय व दिल्ली स्तरीय भाजपा पदाधिकारियों के साथ इस मसले पर बैठक कर स्थिति को परखना शुरू कर दिया है। उधर संघ के बुद्धिजीवियों को सत्ता का सुख मिले लेकिन मामला पिछलें चुनावों की तरह आसान नही होगा। क्योंकि चुनावी समीकरण स्थिति त्रिकोणीय है। जिस तरह भाजपा अनाधिकृत कालोनियों के मुद्दे को लेकर जीत के मंसूबे को पाल रही है। वह भी इतना मारक नही है और न ही वरदान साबित हो सकता है। यह प्लान भी इसे एक तरफा तरीके से सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाने के लिए काफी नही होगा। जबकि केजरीवाल सरकार की मुफ्त सेवाओं की काट के लिए फिलहाल भाजपा ने ठोस तरीके से अब तक नही खोजी है। अगर देखा जाए तो केजरीवाल सरकार की स्थिति को जनता के बीच मजबूत नही तो बेहद खराब भी समझा जाना ठीक नही कहा जा सकता है। क्योंकि केजरीवाल सरकार की मुफ्त योजनायें भी अधिक महत्वपूर्ण गरीब जनता के लिए जैसे भारतीय जनता पार्टी के लिए उसकी एक मुफ्त योजना उज्जवला योजना महत्वपूर्ण साबित लोकसभा चुनाव में हुई थी और बाकी पार्टियों के लिए वह शर्पा साबित हुई थी। ठीक इसी तर्ज पर केजरीवाल सरकार की यह मुफ्त योजनायें इस विस चुनाव में उनके लिए भी वरदान साबित हो सकती है। इसलिए ही भाजपा में बैचेनी है क्योंकि को खूब पता है कि केजरीवाल सरकार उसके महामंत्र को समझ गयी है और उसी मंत्र को भाजपा पर वापस चला दिया है और भाजपा अपनी ही शक्ति का शिकार न हो जाए इस के लिए वह प्रयास में जुटी हुई है। लेकिन रास्ता खोजना उसे मुश्किल पड़ रहा है परंतु इस बार संघ ने भी इस मंत्र की चपेट से भाजपा को बचाने के लिए अपनी रणनीति में बदलाव किया है। वह इस प्रकार है कि संघ के पदाधिकारियों का हमेशा से स्पष्ट कहना रहा है कि संघ केवल राष्ट्रीय स्तर के चुनाव में संघ राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरित पार्टी को मत देने की अपील करता है। विधानसभा चुनाव में वह किसी भूमिका में शामिल नही होता है। लेकिन फिर भी संघ अपने स्तर से यह आकलन कर रहा है कि फिलहाल दिल्ली सरकार के काम-काज पर लोग क्या सोचते है और कितना विश्वास करते है। अभी कितनी उम्मीद है केजरीवाल सरकार पर और भाजपा किन मुद्दो पर क्या कार्य कर रही है इस केस लिए एमसीडी तक के कामों पर संघ की नजरे है। अगर देखा जाए तो अन्य दलो से आयें नेताओं या अन्य को लेकर भी संघ संतुष्ट नही है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद भी दिल्ली में संघ की शाखाओं और सदस्यों की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है तो क्या इससे भाजपा को कुछ बढ़त मिलेगी अगर मिलती भी है तो फतह तक पहुंच पायेंगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *