गुलामी पहले ईस्ट इंडिया की आज गूगल की?

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नरेन्द्र धवन
इतिहास के तथ्यों से देखा जाए तो एक समय था जब मानव अपने आप पर निर्भर था और उसे खुद पर विश्वास भी। फिर भी जो कुछ वो सिखता,खोज करता वह एक दूसरे से सांझा भी करता था।
जिसके कारण ही आदि मानव से सभ्य होते—होते,आदान प्रदान करते-करते वर्तमान में आ पहुंचा।
इस लम्बे सफर मे उसने खोज करते—करते प्रयास कर सफलता प्राप्त कर ही ली।

प्राचीन युग के समय के सभी मानव मानों वैज्ञानिक थे। सभी अपनी-अपनी बौद्धिक क्षमता तथा कुशलता का प्रयोग कर नई खोजबीन करते रहते थे और एक साथ इक्ट्ठा होकर अपने अनुभव को एक दूसरे के साथ शेयर करते थे और उन सब खोजो का सामूहिक परीक्षण करते थे। जिसमें से कुछ अच्छे तरीके क्रम बद्ध तर्को को इक्टठा कर एक नई पहल तलाश लेते थे, एकता एवं कुशलता के साथ नया रूप दे देते थे। इस प्रकार उन सभी का आपसी ज्ञान भी बढ़ रहा था और उन्हें अपने जीवन उपयोगी तथा जीवन शैली  को और अच्छा  बनाने के लिए एक-एक कर अनेक सफलताएं प्राप्त होती चली गयी और धीरे-धीरे आधुनिकीकरण इस तरह बढ़ा कि आज मानव निर्मित यंत्र दैनिक उपयोगी वस्तु और सभी जरूरत की सामग्रियां आधुनिक हो गयी है।

लेकिन अब वर्तमान समय मे व्यक्ति गुलामी की कगार पर खड़ा है। निसंदेह 21 वीं सदी का आज का आधुनिक मानव की सोच एक गुलाम की सी प्रवृति और शोषण करने वाली भ्रष्ट हो गयी है। जिसका मानना है कि किसी से कुछ भी सांझा करोगें तो स्वयं की तरक्की रूक जायेंगी। लिहाजा आज का इंसान एकाकी होता जा रहा है जिसे किसी से भी कुछ पूछने—बताने मे तकलीफ होती है।
आज ईर्ष्या और जलन के कारण लोगो का अनुभव और ज्ञान तो खत्म हो ही रहा है। वही दूसरी तरफ हम मानसिक रूप से यह 21वीं सदी की ईस्ट इंडिया कंपनी यानी गूगल के गुलाम होते जा रहा है। क्योकि कोई भी मनुष्य किसी से कुछ नही पूछता है सीधे ही मोबाइल फोन पर गूगल खोलता है और समाधान निकाल लेता है। वह भी निःशुल्क। जब निःशुल्क जानकारी आप लेंगे जो आप किसी की डॉट या रौब-क्यो सहोगे? सीधे तौर पर गूगल बाबा से जबाव लेगे, यहां तक कि खाना,पानी, होटल, मोबाइल, ट्रेवल यानी सभी जरूरत की समस्याओ का हल गूगल बाबा से प्राप्त करनी है।

अब आप सोचेगें साहब गुलाम कैसे हुए यह तो तथ्य बिल्कुल गलत है। जरा विचार कीजिए जब आपका पड़ोसी सही जानकारी नही देता बिना किसी मतलब के तो गूगल आपको निःशुल्क क्यों दे रहा है। क्या कंपनी में कर्मचारी काम नही करते उनकी सैलरी कहां से निकली होगी। हम मानते है वह दूसरी कंपनियों से पैसा लेते है।  आपका डाटा खर्च होता है लेकिन विचार कीजिए हमे जब कोई जानकारी नही होती है तो हम गूगल से ले लेते है और हमारी सोच मानसिकता भी ऐसी ही हो गयी है। हम किसी से भी कोई जानकारी ले तो वह भी सीधा कहता है गूगल पर टाइप करो सब आ जायेगा। उसका जबाब सही है अब प्रश्न उठता है कि जब पति-पत्नि में विवाद होता है तो वह पति को खाना नही परोसती है और रिश्ते तक टूट जाते है। ऐसे ही कही गूगल बाबा रूठ गये और उन्होंने जानकारी देने से मना कर दिया या बड़ा जुर्माना अथवा टैक्स या जानकारी देने के बदले में शुल्क लेने लगे तो आप क्या करेंगे।

लेकिन यहां प्रश्न आर्थिक नुकसान का तो कतई नही है अपितु प्रश्न है आपकी और हमारी निजता का?
गूगल पर कई देशो की सरकारों ने निजता के उल्लंघन को लेकर कई आरोप भी लगाये है और यह सिद्ध भी हो चुका है कि यदि आपके मोबाईल में गूगल है, तो आप की व आपके फोन में उपलब्ध सारी जानकारी गूगल के पास स्वत ही होगी। यानि आपके हर कदम,हर हरकत और प्रत्येक गतिविधि पर गूगल की नजरें है। सबसे बड़ी चिंता की बात तो ये है कि भारत सरकार ने अभी तक इस ओर कोई ध्यान नही दिया और गूगल दिन—ब—दिन अपने पैर पसारता ही जा रहा है और हम सभी को अपनी गुलामी की बेड़ियों में फंसाता जा रहा है। 

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