समाज को समाज सुधारकों की जरूरत?

समाज समाज समाजसुधारक ज्योतिवाफुले, सावित्रीवाईफुल

क्योंकि यदि उसे एहसास हो जाये कि उसे ऐसा नही करना चाहिए तो कही न कही वह उसे अपना अपमान समझेगा?

Spread the love

दिल्ली अप-टु-डेट

क्या समाज को आज भी वाकई समाज सुधारको की जरूरत है? इस कथन पर सभी के अपने-अपने विचार हो सकते है। जहां तक समाज की दृष्टि से देखा जाए तो युवा वर्ग का व्यक्ति कही न कही अपने आप को अतिबुद्धिमान समझता है। वह स्वयं के निर्णय से ही खुश है कि उन्होंने जो समझा वो सही है लेकिन उसकी परख करना नही चाहता है कि कितना सही व गलत है। क्योंकि स्वयं को नही दिखता कि वह जो कर रहा है वो सही या गलत है? क्योंकि यदि उसे एहसास हो जाये कि उसे ऐसा नही करना चाहिए तो कही न कही वह उसे अपना अपमान समझेगा?

कुछ लोगो का मानना है कि आज समाज सुधारकों की जरूरत नही है। वह इसलिए कि आज के लड़के-लड़कियां अपने माता पिता की बात नही मानते है। वह समाज सुधारकों के विचारों को मानेंगे क्या? वे इनके विचारों को अपनी कसौटी पर कसेंगे। उनके अंदर समझने सीखने सुनने की क्षमता कम हो गयी है। यह समस्या दर्शाती है कि ऐसे लोगो को समाज सुधारको की जरूरत नही है। तो कुछ लोगो का मानना है कि वर्तमान समय में भी समाज सुधारको की जरूरत है और उन्ही समाज सुधारकों के तथ्यों से समाज के लोगो में व्याप्त कुरूतियां दूर की जा सकती है।

क्योंकि आज समाज में कुरूतियां ने अपनी जगह बना ली है। इन कुरीतियों का प्रभाव समाज में दिखाई पड़ता है। कुछ लोग गलत कृृत्य कर रहे है जो भारत देश की संस्कृतिक के लिए श्राप बन रहे है। हालांकि शिक्षा के बढ़ावे ने ज्ञान दिया है लेकिन किसी का अपमान करना नही सिखाया है। कोई किसी की लाजभय नही करता है और सभी अपने आप को उत्तम समझते है मानों रिश्तो की तो मर्यादा ही खत्म हो गयी है। यह सब जल्द से जल्द धनवान बनने के कारण हुआ है। आय दिन सभी सही-गलत कर घोटालें से धन कमाते चले जाते है। उस धन के आने से अहंकार बढ़ जाता है सज्जनता समाप्त होने के साथ-साथ बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।

जबकि सभी जानते है कि अंत समय में किसी के साथ कुछ भी नही जायेंगा। फिर भी इनकी जिज्ञासायें कम नही हो रही है। जबकि पहले समाज में कुरूतियां विद्यमान थी तब उस समय के समाज सुधारकों ने उन सामाजिक कुरूतियों को दूर किया जिससे समाज को नयी दिशा मिली। बात सन् 1800ई0 के करीब की है कि उस समय महिलाएं अधिकतर अशिक्षित पायी जाती थी या तो विद्यालयों की कमी थी अथवा अधिक दूर थे या वो शिक्षा ग्रहण करने के लिए लालयित नही थी। इसके साथ-साथ विधवाओं के पुर्नविवाह नही होते थे।

जबकि बहुत सी विधवाएं 15-18 वर्ष की उम्र की होती थी जो एक अल्प आयु थी। उस समय की यह प्रथा गलत थी। उनका जीवन बीतना बहुत ही मुश्किल था और लोगो में छुआ-छूत की भावना होती थी तो ऐसी समस्याओं-कुरूतियों को दूर करने के लिए समाज सुधारकों ने प्रयत्न प्रांरभ किया जिसमें समाज सुधारका ज्योतिवाफुले, सावित्रीवाईफुल ने सन् 1848 में एक स्कूल की शुरूआत की थी एवं विधवा महिलाओं के अधिकार के लिए सावित्रीवाई ने एक केन्द्र की स्थापना की और इनको पुर्नविवाह के लिए प्रोत्साहित किया तथा छुआछूत जैसी समस्याओं को दूर करने की पहल की थी। लेकिन उन्होंने महिला शिक्षा के लिए वीणा जरूर उठाया था कि वे शिक्षित हो सके, इसलिए नही कि वे अमार्यदित कृत्य करे जो वर्तमान समय में देखने को मिलते है।

इससे तो लगता है कि उस समय की अशिक्षित लड़किया ज्यादा बुद्धिमान थी उनमें अवगुण तो कम देखने को मिलते थे। लेकिन आज शिक्षित होने के बाद भी लड़कियां ऐसे कृत्य कर रही है। जो उस समय के समाज सुधारकों की दृष्टि से उचित नही है। समाज के तमाम तथ्यों एवं पहलुओं पर गौर से देखा जाए एवं समाज के लोगो के कृत्य को देखा जाए तो ऐसा लगता है कि समाज को आज बड़े पैमानें पर समाज सुधारकों की जरूरत है। चाहे वे लड़के हो अथवा लड़किया दोनो में ही अवगुणो कुरूतियों ने अपना घर बना लिया है।

जिसको दूर करने के लिए पहल जरूरी है और इस संबंध में आज समाज को समाज सुधारकों की जरूरत है। अब समाज सुधारकों का जन्म लेना प्रकट होना व प्रकाश में आकर समाज में व्याप्त कुरूतियों को दूर करना जरूरी हो गया है। क्योंकि पहलें के समय में भी समाज सुधारकों ने ही समाज को नई दिशा दी थी और सामाजिक कुरूतियों को दूर किया था। हालांकि पहले उनकी आलोचना हुई बाद में समाज ने उनके विचारों को महत्व दिया। आज भी समाज सुधारकों की पहले आलोचना तो हो सकती है लेकिन भविष्य में इसका सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *