प्रथाओं की जंजीरों ने जिंदगी को बना दिया पिक्चर।

प्रथाओं की जंजीरों

गरीबी का चाबुक प्रथाओं का हाथ ढाहता रहा कहर।

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गरीबी का चाबुक प्रथाओं का हाथ ढाहता रहा कहर।

दिल्ली अप-टु-डेट

समाज और प्रथाएं एक दूसरे की पूरक हैं और प्रथाएं आज भी लोगों पर हावी हैं। एक तरफ समाज व्यक्ति को उसकी प्रथाओं की नीतियों के अलावा आगे कुछ करने की अनुमति नहीं देता है। अगर उस समाज की नीतियों प्रथाओं को दरकिनार कर कोई भी व्यक्ति अथवा परिवार कुछ नया करते हैं तो वह समाज उस व्यक्ति अथवा उसके परिवार को समाज की नीतियों के तोड़ने व उनका पालन ना करने के कारण समाज से निष्कासित अथवा अछूता मान लेते हैं।

समाज की मान्यता के अनुरूप वह व्यक्ति अपवित्र माना जाता है। मतलब उस समाज के योग्य नहीं रह जाता है। इस प्रकार तो समाज का इतना कठोर संविधान है। इसके साथ लचीला भी है। अब व्यक्ति जब समाज की प्रथाओं और रीति-रिवाजों के विपरीत चला गया और उसके बाद वह अपनी गलती को स्वीकार कर उसी समाज में सम्मिलित होना चाहता है तो समाज उसे पुनः वापस अपवित्र से पवित्र करने के लिए उस पर दंड वसूलता है।

वह इस प्रकार कि उस व्यक्ति को पूरे समाज को भोज कराना पड़ेगा और फिर उस समाज के सभी व्यक्ति उसके यहां भोज करेंगे तभी वह व्यक्ति उस समाज के योग्य हो पाएगा अन्यथा नहीं। ऐसी प्रथाएं आज भी भारत के गांवों के समाजों में प्रचलित हैं और सभी व्यक्ति उन प्रथाओं की जंजीरों में जकड़े रहते हैं। उन सामाजिक प्रथाओं के विपरीत जाने का साहस तक नहीं जुटाते हैं। समाजो की इन प्रथाओं एवं रीति-रिवाजों के चाबुक की मार की चपेट के भय से ना जाने कितने दिल एक नहीं हो पाते और हो भी जाते हैं तो प्रमाणित नहीं माने जाते हैं। क्योंकि वह समाज उन्हें मान्यता नहीं देता है।

आज के आधुनिक युग में सभी सोच रहे हैं कि समाज को क्या मतलब इन सब चीजों से प्रश्न तो यह भी बनता है तो दूसरी ओर नगरीकरण है नगरों में बसी अधिकतर जनता तो ग्रामीण क्षेत्रों की है वह समाजों से निकलकर आकर बसी है यहां जन्मे आज के बच्चे व युवा पीढ़ी समाज की प्रथाओं को जानते एवं मानते भी नहीं है। यह तो खूब ही देखने को मिल रहा है। लेकिन इसका परिणाम भी युवा पीढ़ी के सामने कुछ ही समय बाद आ जाता है। तब इनके समझ में पूरी कहानी आती है क्योंकि व्यक्ति का जीवन ऐसा है जिसमें कई उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। वह इस प्रकार जब कोई व्यक्ति सामाजिक मान्यताओं नियमों को तोड़कर कोई भी गलत कार्य करता है।

मानो जैसे शादी ही दूसरे किसी धर्म जाति से कर लेता है तो समाज उसे समाज के अधिकारों से वंचित कर देता है। लेकिन समाज के ठेकेदारों के नियम भी सिर्फ गरीबों पर ही लागू होते हैं अमीरों पर नहीं। उसी समाज का अमीर व्यक्ति करें तो कोई दिक्कत ना समाज को होती है ना उनके ठेकेदारों को एवं उनके परिवारों पर इसका कोई बड़ा असर दिखाई नहीं देता है। लेकिन इसका बुरा असर गरीब परिवारों को देखने को जरूर मिलता है।

क्योंकि समाज उसे समाज से वंचित कर देता है और फिर उस व्यक्ति के बच्चों की शादियों में बड़ी दिक्कतें आती हैं। इसी भय के कारण आज भी लोग लिव इन रिलेशन में बंध जाते हैं और समाज के नियमों को तोड़कर शादी नहीं करते क्योंकि उन्हें वह रहता है। कि समाज उन्हें सामाजिक अधिकारों से वंचित कर देगा। ऐसा ही एक मामला झारखंड के रांची के काके प्रखंड के सांगा गांव से सामने आया है। जहां प्रथा है कि जो व्यक्ति शादी करेगा वह समाज को भोज कराएगा मतलब शादी की पार्टी देगा तभी उसकी शादी को समाज मान्यता देगा।

जो व्यक्ति ऐसा नहीं करेगा समाज उसकी शादी को मान्यता नहीं देगा इस तरीके की सामाजिक प्रथा में उस समाज का व्यक्ति सुध्देश्वर गोप फंस गया और सामाजिक रीति—प्रथाओं के चाबुक की मार झेलता रहा। व्यक्ति सुध्देश्वर गोप पेशावर मजदूर है। अति गरीबी के चलते उसके पास कभी इतना पैसा नहीं हो पाया कि वह शादी कर समाज को भोज करा सके एवं समाज से अपनी शादी को मान्यता दिला पाए। सुध्देश्वर गोप (55) व उसकी पत्नी परमी गोप (50) पिछले 30 सालों से बगैर शादी के ही पति—पत्नी के रूप में साथ रहने लगे और इस दौरान 4 बच्चों का जन्म हो गया।

परंतु शादी नहीं कर पाए इस दौरान। दोनों की लड़की शादी योग्य हो गई। लेकिन इन 30 सालों में भी कभी पैसा नहीं हो पाया जो लड़की की बरात कर भोज करा सकें और समाज से शादी को मान्यता दिला सके। मां की तरह लड़की कलावती भी 6 सालों से लिव इन रिलेशन में रहने लगी और उसके भी एक बच्चे गोपाल का जन्म हो गया तब जाकर वक्त ने करवट ली और एक सामाजिक संस्था द्वारा आयोजित सामूहिक शादी कार्यक्रम का आयोजन हुआ।

जिसमें 150 जोड़ों ने फेरे लिए इसी में मां परमी गोप व सगी बेटी कलावती गोप ने एक ही मंडप में एक ही साथ फेरे लिए इस अनोखी शादी को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। दादी व मां की शादी का गवाह ढाई साल का बच्चा गोपाल बना। मंडप में बैठे अधेड़ दूल्हा दुल्हनों के चेहरों पर खुशी स्पष्ट नजर आ रही थी। इस वैवाहिक कार्यक्रम में सभी की नजरें मां बेटी की शादी पर थी।

इस शादी समारोह के मंगल बंधन में बंधने वाले जोड़े अन्य धर्मों के भी थे और सब की शादियां अपने-अपने रीति-रिवाजों से हुई। शादी के बाद नव दंपतियों को लोगों ने शुभकामनाएं दी व उपहार दिए। इस मौके पर सामूहिक भोज का भी आयोजन हुआ और इनकी शादी को भी सामाजिक मान्यता मिल गई। उन लोगों ने भी अपने रिश्तो को नाम दिया जो उपरोक्त की तरह वर्षों से रह रहे थे। इस तरह समाज व प्रथाओं की जंजीरों ने मां-बेटी की शादी को एक काल्पनिक घटना की पिक्चर बनाकर रख दिया। जो कहीं ना कहीं आज के युग में गलत है। लेकिन समाज के ठेकेदार इन चीजों को आधुनिकता में भी त्यागना नहीं चाह रहे हैं।

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