स्वयं को विद्वान समझना और ज्ञानी से बहस करना मूर्खता है?

विद्वान मूर्खता रोजगार व जीविका

विद्वान व्यक्ति बहुत कम बोलता है और बहुत ही ज्यादा अपनी जुबान पर संयम रखता

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दिल्ली अप-टु-डेट
वर्तमान समय में सभी अपने आप को विद्वान समझते है। ज्यादातर यूथ पीढ़ी में देखने को मिलता है वह किसी भी तरह का संकोच नही करते और न ही उस क्षेत्र का अनुभव रखते है फिर भी बहस शुरू कर देते है। यह आमतौर पर आप कही भी देख सकते है। जबकि विद्वान व्यक्ति बहुत कम बोलता है और बहुत ही ज्यादा अपनी जुबान पर संयम रखता है। यह उसकी विद्वानता का परिचय है। लेकिन उसी विद्वान व्यक्ति से कुछ ज्ञान और अनुभव लेकर कुछ तो महान बन जाते है और कुछ मूर्ख प्रवृति के मनुष्य उस ज्ञान को अध्यन मंथन करने की वजह वे फालतू की बहस में खत्म कर देते है।

जबकि स्वयं को विद्वान समझने की वजह इस दुनिया में उपस्थित मनुष्य, पेड़, जीव, जन्तु पहाड़, नदिया, वन सभी को अपने आप से बड़ा विद्वान और ज्ञानी समझना चाहिए। क्योंकि विद्वान बनना आसान नही है और न ही रोजगार व जीविका चलाने का हुनर सीख कर कोई विद्वान कहलाने के लायक हो जाता है।

विद्वान तो विद्वान होता है और वह अनेको अनुभव ज्ञानों का धनी होता है। उसे खुद नही पता होता है कि उसे कितना ज्ञान अनुभव है। क्योंकि जिसे भी अपने पूर्ण ज्ञान का बोध है वह कभी ज्ञानी नही कहलाया जा सकता है। ज्ञान समुन्द्र से भी बड़ा गहरा और विशाल है जिस प्रकार समुन्द्र की गहराई तथा जल के सहन करने की क्षमता का आकलन नही किया जा सकता है। ठीक उसी प्रकार ज्ञान की क्षमता का आकलन करना मुश्किल है।

लेकिन आज के कुछ धुर्त व मूर्ख युवक-युवतिया थोड़ा बहुत सीख जाते है और उससे अपनी जीविका संचालन करने लगते है तो वह अपने आप को पहाड़ से ऊँचा ज्ञानी व अनुभवी समझने लगते है और उस एक क्षेत्र के ज्ञान को वह भी आधे-अधूरे ज्ञान को इतना ज्यादा महत्व देते है समझते है उस के इस ज्ञान के समान संसार में कोई ज्ञानी नही है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि व्यक्ति के अंदर जलन ईष्र्या उत्पन्न हो गयी है।

वह उसे कुछ समझने व सोचने का वक्त नही मिलने देती है। जबकि यह पूर्ण रूप से गलत है। क्योंकि देश व विश्व के अंदर इतना ज्ञान व अनुभव है जिसे हासिल कर पाना ही मुश्किल है। आज की यूथ पीढ़ी व कुछ शिक्षित मास्टर डिग्री धारक व्यक्ति इतनी सी शिक्षा प्राप्त कर लेते है तो वह अपने आपको विद्वान समझने लगते है।

किसी भी मुद्दे पर बिना किसी लक्ष्य के और बिना किसी लाभ के उस विषय पर चर्चा प्रारंभ कर देते है और उस चर्चा को करते-करते आपस में झगड़ा तक कर लेते है। इतना झगड़ा कि फिर वे उसे नीचा दिखाने की फिराक में उसकी जीविका में भी बाधा पहुंचाने का प्लान बनाने लगते है और यह उसको हर तरीके से झुकाना चाहता है जो अपने आप में एक बहुत ही मार्मिक चित्रण होता है। क्या ऐसे पुरूषों को ज्ञानी कहा जा सकता है।

ऐसे व्यक्तियों से हमेशा दूरी बनाकर चलना व शांत रहना ही उचित है। क्योंकि अगर आप भी ऐसी परिस्थिति में फंस जाते है तो ऐसे मूर्खो के समक्ष चुप रहकर ही आप सफलता पा सकते है। जबकि ज्ञान की प्राप्ति हमेशा अध्यन करने से होती है और वह अध्यन व्यक्ति को युवको-युवतियों को किसी न किसी विषय पर करते रहना चाहिए। निरन्तर अध्यन करना सोचना, खुली आँखों से सपने देखना ज्ञान को बढ़ाने में सार्थक सिद्ध हो सकते है और व्यक्ति को हर समय सीखने की जिज्ञासा को अल्र्ट पर रखना चाहिए।

क्योंकि पता नही कौन से समय अचूक ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। अगर आपकी जिज्ञासा जाग्रित रहेगी तो निश्चित ही आप उस ज्ञान को ग्रहण कर सकते है। अगर आप थोड़ा भी व्यस्त हुये तो वह ज्ञान व अनुभव प्राप्त करने का अवसर आप के हाथ से निकल चुका होगा। बहुत से हुनर व अनुभव ऐसे है जो हमे नदियों, झीलों, पशु-पक्षियों, वनो से प्राप्त होता है और सही वक्त के रहते वह ज्ञान आपको लाभदायक सिद्ध हो सकता है।

इस सब को प्राप्त करने के लिए हमें लचीला व झुकाव दार फलदार वृक्षों की भांति रहना होगा तभी हम सीख पायेंगे अथवा नही। अगर हम बहस कर सीखना चाहे तो सिर्फ झगड़ा करने के अलावा कुछ भी सीखना मुश्किल ही नही न मुमकिन है। क्योंकि समाज में व्यापत कुरूतियों के बीच इस समाज में कुछ ऐसे बड़े मूर्ख व अज्ञानी है जो आपको ऐसे शब्द बोलेगे जो आप सहन नही कर सकते है।

लेकिन अगर उन्हे सहन कर लिए अपने ठण्डे स्वभाव से उन मारक शब्दो की अग्नि को बुझा दिया जो आप जरूर कुछ न कुछ उन कटु वचनों से भी हासिल कर सकते है। लेकिन आप की यूथ पीढ़ी की मानसिकता इतनी बदल गयी है कि वह कुछ सुनना पसंद नही करती है। शायद इसलिए ही समाज से ज्ञान कम होता जा रहा है तथा उस ज्ञान की कमी होने के कारण ही सभी स्वयं को विद्वान समझ रहे है। अपने ज्ञान जैसा कोई ज्ञानी नही है और कायरों की तरह अपने प्रताप की कथनी कह रहे है यह मूर्खता नही समझा जाये तो आप क्या समझेंगे।

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