नई दिल्ली: राजनीति में शुचिता और व्यक्तिगत सम्मान पर कीचड़ उछालने वालों को तीस हजारी कोर्ट ने कड़ा सबक सिखाया है। भाजपा के दिग्गज नेता और पार्षद मनोज जिंदल के खिलाफ अलीगढ़ के कथित अखबार और सोशल मीडिया के जरिए चलाए जा रहे दुष्प्रचार के गंदे खेल पर अदालत ने न केवल पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है, बल्कि अपमानजनक पोस्ट्स को जड़ से मिटाने का भी आदेश दिया है।
बेपर्दा हुआ झूठ, कटघरे में ‘फेक न्यूज’ के सौदागर
अदालत के भीतर जब सच का सामना हुआ, तो भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े दावे करने वाले प्रतिवादी कथित पत्रकार बगलें झांकने लगा । पार्षद पर फॉर्च्यूनर कार और करोड़ों के प्लॉट हड़पने का आरोप लगाने वाले शख्स के पास अपनी बात साबित करने के लिए फूटी कौड़ी का सबूत नहीं था। जिला न्यायाधीश माननीय नरेश कुमार लाका के कड़े सवालों के बीच प्रतिवादी ने खुद स्वीकार किया कि उसके गंभीर आरोप केवल ‘हवाई बातों’ और ‘अफवाहों’ पर टिके थे।
अदालत का ‘गैग ऑर्डर’: अब बंद होगी जुबान!
न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि पत्रकारिता व अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब किसी की इज्जत से खेलना कतई नहीं है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि:
- 72 घंटे के भीतर फेसबुक और व्हाट्सएप से मानहानिकारक कूड़ा साफ किया जाए।
- भविष्य में मनोज जिंदल के खिलाफ एक शब्द भी अपमानजनक लिखा तो कड़ी कानूनी कार्रवाई होगी।
- अदालत ने इन आरोपों को न केवल झूठा, बल्कि ‘अमर्यादित’ और ‘घृणित’ करार दिया है।
मनोज जिंदल की ओर से दायर 1.99 करोड़ रुपये के इस मानहानि के मुकदमे ने यह संदेश दे दिया है कि सार्वजनिक जीवन में सेवा करने वालों की प्रतिष्ठा को ‘सस्ती पब्लिसिटी’ के लिए निशाना बनाने वालों का अंजाम अब सलाखों के पीछे या भारी जुर्माने के बीच होगा। इस हाई-प्रोफाइल मामले की अगली सुनवाई मे अदालत हर्जाने की राशि और अन्य कानूनी पहलुओं पर विचार करेगी।
पीतपत्रकारिता के ज़रिये पहचान बनाने वाले लालची पत्रकारों को किसी की आबरू को बेबुनियाद अफ़वाहों पर उछालने का अधिकार न क़ानून देता है न संविधान ऐसे लोगों पर कड़ी कार्यवाही होनी चाहिये ताकि दूसरे लोगों के लिये ऐसे फ़ैसले नज़ीर बने ।