भारत मंडपम में गूंजा ‘इंद्रप्रस्थ राग सागर’: श्री गणपति सच्चिदानंद स्वामीजी का ऐतिहासिक 365वाँ संगीत समारोह संपन्न

नई दिल्ली: राजधानी का प्रतिष्ठित भारत मंडपम शनिवार, 19 अप्रैल 2026 को एक दिव्य आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बन गया। अवसर था अक्षय तृतीया की पूर्व संध्या पर आयोजित ‘इंद्रप्रस्थ राग सागर’—जो परम पूज्य श्री गणपति सच्चिदानंद स्वामीजी द्वारा संचालित 365वाँ म्यूज़िक फॉर मेडिटेशन संगीत समारोह था।

यह आयोजन केवल एक संगीत संध्या नहीं, बल्कि दशकों की उस वैश्विक आध्यात्मिक यात्रा की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही, जिसमें स्वामीजी ने संगीत को आंतरिक उपचार और ध्यान के माध्यम के रूप में प्रतिष्ठित किया है।

इस ऐतिहासिक आयोजन की अध्यक्षता श्री दत्तात्रेय ज्ञान बोध सत्संग सभा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा की गई। कार्यक्रम की गरिमा को बढ़ाते हुए भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने अपना आध्यात्मिक वीडियो संदेश भेजा, जिसमें उन्होंने स्वामीजी द्वारा ‘नाद योग’ की परंपरा को पुनर्जीवित करने के प्रयासों की सराहना की।

समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ, जिसमें परमपूज्य श्री स्वामीजी और पूज्य श्री दत्त विजयानंद तीर्थ स्वामीजी के साथ देश की कई दिग्गज विभूतियाँ शामिल रहीं जिनमे न्यायमूर्ति वी. रामसुब्रमणियन (पूर्व जज, सुप्रीम कोर्ट व अध्यक्ष, NHRC), श्री आर. वेंकटरमणि (महान्यायवादी, भारत), और श्री आर. एन. चौबे (सेवानिवृत्त IAS व पूर्व सदस्य, UPSC), दिल्ली के उपमुख्यमंत्री श्री प्रवेश साहिब सिंह वर्मा, जी. मल्लिकार्जुन राव (अध्यक्ष, GMR ग्रुप) और श्री के. नारायण राव (उप प्रबंध निदेशक, GMR ग्रुप), पद्म विभूषण डॉ. एल. सुब्रमणियम, पार्श्व गायिका कविता कृष्णमूर्ति सुब्रमणियम और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता आर. कृष्णमूर्ति प्रमुख रहे।

संध्या के मुख्य आकर्षण के रूप में स्वामीजी ने ध्यान और उपचार के लिए राग कीरवाणी को चुना। अपनी गहन भावनात्मक गूंज के लिए प्रसिद्ध इस राग ने भारत मंडपम के प्लेनरी हॉल में मौजूद 2,000 से अधिक श्रोताओं को आत्मनिरीक्षण की ओर प्रेरित किया।

संगत में विश्व प्रसिद्ध वायलिन वादक डॉ. एल. सुब्रमणियम की कलात्मकता ने संगीत में दिव्यता भर दी। लय पक्ष पर विद्वान रामकुमार मिश्रा (तबला) और विद्वान शंकर रमेश (मृदंगम) ने स्वामीजी के स्वरों के साथ अद्भुत सामंजस्य बिठाया।

365 समारोहों की पूर्णता को प्रतीकात्मक रूप से एक वर्ष के चक्र के समान माना गया, जो पूर्णता और निरंतरता का प्रतीक है। जैसे-जैसे कीरवाणी के आलाप हॉल में गूंजे, वातावरण केवल मनोरंजन से ऊपर उठकर भक्ति और समर्पण के संगम में बदल गया।

शासन, कानून, उद्योग और संगीत जगत के इन दिग्गजों की उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि स्वामीजी का संगीत मिशन सीमाओं और क्षेत्रों से परे जाकर मानवता को जोड़ने का कार्य कर रहा है।

Narender Dhawan
Author: Narender Dhawan

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