तंबुओं से पक्के मकानों तक, गांधी कैंप ने देखी विस्थापितों की संघर्षगाथा
रोहतक मैं गांधी कैंप हूं। आज मेरे आसपास पक्के मकान, बाजार और शहर की रफ्तार दिखाई देती है, लेकिन मेरी कहानी उन परिवारों से शुरू होती है जो वर्ष 1947 में विभाजन के बाद पाकिस्तान से उजड़कर यहां पहुंचे थे। उनके पास अपना पुराना घर नहीं था, भविष्य की कोई निश्चित तस्वीर नहीं थी। शुरुआत … Read more