संपादकीय: नरेंद्र धवन
आज जब दुनिया की नजरें मध्य-पूर्व के नक्शे पर खिंची उन लाल लकीरों पर टिकी हैं जो तीसरे विश्व युद्ध की आहट दे रही हैं, तब ईरान के भीतर से एक ऐसी गर्जना सुनाई दे रही है जो बारूद के शोर से कहीं अधिक शक्तिशाली है। यह गर्जना किसी मिसाइल की नहीं, बल्कि उन हजारों ईरानी महिलाओं के कंठों से निकला ‘आजादी’ का वो गीत है, जिसे दशकों तक बंदूकों के साये में दबाने की नाकाम कोशिश की गई। सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मृत्यु केवल एक राजनीतिक शून्य पैदा नहीं कर रही, बल्कि यह उस ‘डर के साम्राज्य’ के अंत की आधिकारिक घोषणा है, जिसकी सबसे बड़ी शिकार वहां की आधी आबादी थी।
एक चिनगारी, जिसने व्यवस्था को झुलसा दिया ईरान में आज जो कुछ भी घट रहा है, वह अचानक उपजा असंतोष नहीं है। इसकी जड़ें 2022 की उस काली दोपहर में छिपी हैं जब महसा अमीनी की मौत ने पूरे देश की आत्मा को झकझोर दिया था। तब से लेकर 2026 के इन शुरुआती महीनों तक, ईरानी महिलाओं ने लहू से एक ऐसी इबारत लिखी है जिसे मिटाना अब मुमकिन नहीं लगता । सोशल मीडिया पर वायरल होती वह तस्वीर—जिसमें एक महिला खामेनेई की जलती तस्वीर के सामने निर्भीक खड़ी है—ईरान के नए संकल्प का पोस्टर बन गई है। यह महज एक प्रतीकात्मक विद्रोह नहीं है, यह उस पितृसत्तात्मक तानाशाही को सीधा जवाब है जिसने हिजाब को शालीनता नहीं, बल्कि गुलामी का पट्टा बना दिया था।
‘जीन, जियान, आजादी’: एक वैश्विक गूँज कुर्दिश भाषा से निकला नारा ‘जीन, जियान, आजादी’ (महिला, जीवन, स्वतंत्रता) अब केवल तेहरान की गलियों तक सीमित नहीं है। यह दुनिया भर के दबे-कुचले समाजों के लिए एक ‘मैनिफेस्टो’ बन चुका है। तेहरान से मशहद और शिराज तक, महिलाएं अपने हिजाबों को अलाव में झोंक रही हैं और अपने बाल काटकर उस ‘स्वच्छंदता’ का परिचय दे रही हैं, जिसे दशकों से पाप बताया गया।
यह आंदोलन अब सिर्फ कपड़ों की आजादी तक ही सीमित नहीं है। यह ‘रेजिस्टेंस यूनिट्स’ (प्रतिरोध इकाइयों) के रूप में एक राजनीतिक शक्ति में तब्दील हो चुका है। आज की ईरानी छात्राएं और कामकाजी महिलाएं केवल प्रदर्शनकारी नहीं हैं, वे रणनीतिकार हैं। वे शासन में बराबर की हिस्सेदारी और एक पूर्ण लोकतांत्रिक गणराज्य की मांग कर रही हैं। वे जानती हैं कि खामेनेई के बाद का ईरान वैसा नहीं हो सकता जैसा उनके पूर्वजों ने झेला था।
कीमत, जो चुकाई गई इतिहास गवाह है कि आजादी कभी भी मुफ्त नहीं मिलती, और ईरान की बेटियों ने इसकी भारी कीमत चुकाई है। एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्टें गवाह हैं कि 2026 के इन खूनी महीनों में कितने किशोरों और महिलाओं की सांसें बेरहमी से रोक दी गईं। लेकिन जेल की कालकोठरियां और यातनाएं भी उस आग को नहीं बुझा सकीं जो महसा की मौत ने जलाई थी। आज जब वे सड़कों पर जश्न मना रही हैं, तो उनके चेहरों पर जीत की मुस्कान के साथ-साथ उन साथियों की याद में आंसू भी हैं जिन्होंने इस ‘सुबह’ को देखने के लिए अपनी ‘शाम’ कुर्बान कर दी।
भविष्य की दहलीज पर खड़ा ईरान सवाल अब यह नहीं है कि खामेनेई के बाद कुर्सी पर कौन बैठेगा, बल्कि सवाल यह है कि क्या कोई भी नया शासक इन जागी हुई महिलाओं की आंखों में आंखें डाल पाएगा? अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी अब यह स्पष्ट है कि ईरान का भविष्य अब तेल की पाइपलाइनों या परमाणु रिएक्टरों से नहीं, बल्कि वहां की महिलाओं के सशक्तिकरण से तय होगा। वे समान वेतन, शिक्षा की पूर्ण स्वतंत्रता और संपत्ति के अधिकारों के साथ एक ऐसा समाज चाहती हैं जहाँ ‘मोरालिटी पुलिस’ का कोई स्थान न हो।
ईरान में आज जो हम देख रहे हैं, वह सत्ता का सामान्य हस्तांतरण नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक पुनर्जन्म है। यह उन लाखों महिलाओं की जीत है जिन्होंने ‘ना’ कहना सीखा। तेहरान की दीवारों पर लिखे नारे और फिजाओं में तैरती उनकी हंसी एक ही बात कह रही है—तानाशाहों का अंत निश्चित है, लेकिन मनुष्य की स्वतंत्रता की भूख अमर है।
यह अंत नहीं, एक ऐसे ईरान की शुरुआत है जहाँ बेटियाँ अब डर में नहीं, बल्कि गर्व के साथ सर उठाकर चलेंगी।