आनंदपुर साहिब/कीरतपुर साहिब
बैसाखी के पावन अवसर पर जहां एक ओर नगर कीर्तन निकाले जा रहे थे, वहीं दूसरी ओर देर रात कीरतपुर साहिब और आनंदपुर साहिब के बीच फायरिंग की घटना से हड़कंप मच गया।
जानकारी के अनुसार, जालंधर से आनंदपुर साहिब जा रही संगत जब उक्त स्थान पर पहुंची, तो कुछ हमलावरों ने गोलियां चला दीं। अचानक हुई फायरिंग से मौके पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया। गनीमत रही कि इस घटना में किसी प्रकार का जानी नुकसान नहीं हुआ। हालांकि, घटना ने श्रद्धालुओं में दहशत जरूर पैदा कर दी। पुलिस मामले की जांच में जुट गई है और हमलावरों की पहचान करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
जानें कैसे शुरू हुई बैसाखी पर्व मनाने की परंपरा
14 अप्रैल का दिन आते ही मन में एक अलग ही उमंग भर जाती है, क्योंकि यही वह दिन है जब हम सब मिलकर बैसाखी का त्योहार मनाते हैं. इस साल 2026 में भी यह त्योहार खुशियों की नई सौगात लेकर आ रहा है. सौर कैलेंडर के हिसाब से देखें तो यह नए साल का पहला दिन है, जब सूर्य मेष राशि में कदम रखते हैं. उत्तर भारत में तो इस दिन की रौनक देखते ही बनती है. किसान अपनी लहलहाती सुनहरी फसल को देखकर फूले नहीं समाते और भगवान का शुक्रिया अदा करते हैं. नदियों में आस्था की डुबकी लगाना और दान-पुण्य करना इस दिन को और भी पवित्र बना देता है, जिससे मन बिल्कुल शांत और सकारात्मक हो जाता है।
आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की नींव
सिख धर्म में बैसाखी का जिक्र आते ही दिल गर्व और श्रद्धा से भर जाता है. इसी खास दिन साल 1699 में गुरु गोविंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में ‘खालसा पंथ’ की नींव रखकर एक नया इतिहास लिख दिया था. उन्होंने पांच प्यारों को अमृत चखाकर एक ऐसी निडर कौम तैयार की, जो किसी भी जुल्म के आगे झुकना नहीं जानती. आज के दिन गुरुद्वारों में होने वाले कीर्तन और अरदास की गूंज सीधे रूह को छू लेती है. सड़कों पर सजे नगर कीर्तन और पांच प्यारों की वह आन-बान देखकर हर किसी का सिर फख्र से झुक जाता है. यह पावन पर्व हमें याद दिलाता है कि मानवता की सेवा और सच्चाई की राह पर डटे रहना ही इंसान का असली धर्म है।
फसलों का त्योहार और प्रकृति का आभार
बैसाखी का असली मतलब ही है खुशियों से भर जाना और प्रकृति के करीब आना. जब खेतों में सुनहरी गेहूं की फसल कटने को तैयार होती है, तो किसानों का दिल झूम उठता है और वे ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्धा पाकर अपनी खुशी मनाते हैं. हर घर से पकवानों की सोंधी खुशबू आने लगती है और लोग पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाकर नए साल की बधाई देते हैं. लंगर में एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करना भाईचारे की सबसे सुंदर तस्वीर पेश करता है. शाम ढलते ही मोहल्लों में नाच-गाना और हंसी-मजाक का जो दौर चलता है, वह हमें याद दिलाता है कि मेहनत का फल वाकई बहुत मीठा होता है. यह त्योहार अपनों के साथ मिलकर जिंदगी का जश्न मनाने का एक प्यारा सा मौका है।
दान का पुण्य और सात्विक स्वाद की मिसाल
पुरानी मान्यताओं की मानें तो बैसाखी पर किए गए दान का फल कभी खत्म नहीं होता. किसी प्यासे को पानी पिलाना या किसी जरूरतमंद को अन्न देना इस दिन का सबसे बड़ा पुण्य है. घर की रसोई में जब मां अपने हाथों से गुड़ वाले चावल या मीठी खीर बनाती हैं, तो उस सात्विक स्वाद की तुलना किसी भी बाजार की मिठाई से नहीं की जा सकती. शुद्ध घी और प्यार से बने इस भोग को ईश्वर को अर्पित करने से घर में हमेशा बरकत बनी रहती है. अपनों के बीच बैठकर सादा और शुद्ध भोजन करना ही असली सुख है. यह दिन हमें सिखाता है कि ईश्वर की भक्ति और अपनों का साथ ही जीवन की असली पूंजी है।